हो, ना हो

letters

 

शायद ना होते, तो बेहतर होता
पर ना होते, तो होता भी क्या?
होने, ना होने में इतना ना उलझ जाऊ
कि जो है वो भूल जाऊ

तुम हो, ये तय है
तुम हो नहीं सकते, ये भी तय है
पर बिखरे हुए खयालों के टुकड़ों
को चादर पर फौला दूँ
तो होता यूँ है
कि
टुकड़ों में तुम हो जाते हो,
और टुकड़ों के बीच
मैं रह जाती हूँ।

तुम्हारे होने
और मेरे रह जाने में
जो हो नहीं सकता
उस पर दस्तक दे जाती हूँ।

हर चौखट पर पड़ी चिट्ठी
न होती, तो होता भी क्या?

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3 Comments

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3 responses to “हो, ना हो

  1. Smriti Dhandhania

    Tum ho tabhi yeh blog h
    Tum na hote toh literature ka kya hota

  2. This is too good. I am so glad I follow you.

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