Could-have-beens

 

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सुना है किसी देश में लोग
मन्नतों के नाम ताले लगाते है
यहा लोग डोरी बाँधते है
कुछ लोग दिए जलाते है
इतना ऐतबार कर लेते है उस पर जिसे कभी देखा ही नहीं

मन्नतें सुनता कौन है?
क्या कोई मन्नतों का एक लिस्ट बनाता है?                                                                                                                       category-wise                                                                                                                                                      money in one column, houses in another                                                                                                 love leaves all columns too short
उस देश में शायद ताले लगा देते है मन्नतों पर
ताकि वो कही उड़ ना जाए, किसी पराए के घर में
किसी और के दिल से वो ना निकले
और किसी को वो ना मिल जाए खुद से पहले

या शायद मन्नतों पर ताले लगाना ही सही है
मन्नतें सब कहा करते है
लोग तो सिर्फ़ माँगते है

उन मन्नतों पर ताले लगाकर
कितने पल इंतेज़ार में बीत जाते है?
गिना है कभी?
कितने पलों बाद हम भूल जाते है हर मन्नत को?
कितने दिनों बाद भी सो नही पाते उस मन्नत के बिना?
कितने बार ही उस ताले को जाकर देखते है
उसकी हिफ़ाज़त करते है
कितने महीनो बाद याद नही रहता
कौनसा टाला था अपना

हर मन्नत के बीच, तालों में क्या मेरा-तेरा
जो है वो सलामत है
यही काफ़ी है

कविता भी शायद मन्नत है
उनका, जो मुककममल ना हुए

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2 Comments

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2 responses to “Could-have-beens

  1. Mannate na khane ki mannat maango,
    ek mannat kaafi hai, sari mannate bhulane k liye.

    Wow! Read a beautiful poetry after such a long time. Very nice. Loved these lines “…jo hai wo salaamat hai, yahi kaafi hai…”

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