Look at the homes that we have built for ourselves

look at the homes that we have built for ourselves

look at them dismantling, undressing
before their foundation days
look at them in ruins already
already
before mortar or walls
or windows or corridors
morning light white curtains
tea spills dirty shoes
look at them
look at us
without homes
renting homes
packing
and unpacking
not enough closet space
not enough breathing area
this home and that
and none at all
look at your homes
the ones with eyes, deep and empty
the ones with hands, always receiving
the ones that they built for you
he she they
count their names on the windows
forget the ones you made into homes
vast areas of land cannot be found
homes :
there is no home
other than the one you were born into.
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“There will be time, there will be time”

The truth of there being no time is so opposing to the lives that we lead that we cannot understand how all of the time that was ours slips away. We behave almost like time is also a possession, like it is yours and mine, forgetting that time is beyond belonging, that by virtue of its very nature it is no one’s, not even its own.
Nobody owns it, and yet it is within our capacities to give it to people. How are you? Why are you upset today? I’m sorry I couldn’t talk then, what were you saying? I love you. I missed you today. When can we meet? You haven’t spoken to me in a long time. We are made to believe that it is love that we need, the irrevocable love of a someone who will forever swear loyalty to us, But that’s just bullshit. All we really need is time.
The thing is, love is giving time. Love is the act of sitting down and listening, not the act of mere proclamation. Love is knowing that words sometimes cover time and sometimes silences do, but both need the spending of time, that sometimes people just need others to be unselfish, for just one moment in time to believe again in themselves. Love is time.
The people who truly uplift us, who make up the ideas of happiness that we have, are the ones who give us the most time. Because even though it is beyond all belonging, in reality, time is all we have.

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ताबीर

giphy

उस रोज़ जो उनको देखा है अब ख्वाब का आलम लगता है
उस रोज़ जो उनसे बात हुई वो बात भी थी अफसाना क्या  (1)

गीत सुना है कभी?                                                                                                                                                नहीं, मेटल रॉक नहीं
बोलीवूद, जॅज़ या पोप भी नहीं
गीत नहीं समझते?
सुर ताल नहीं, कुछ और
रूह?
या शायद तुम खुद ही

गीत

पानी पर जैसे चलते ना जाने कौन-कौन
एक भीड़ सी जमती है
जीवन में, जीवन के लिए

ekhon gangar teere ghumonto darale
chitkath daake- aaye aaye (2)

 

इतनी जल्दी भी क्या है?
एक अफ़साना ख्वाब में देखा
एक ख्वाब अफ़साना है

कभी-कभी
यों हो जाता है
गीत कहीं कोई गाता है
गूँज किसी
उर में उठती है  (3)

धीमी सी है चाँदनी
ल़हेर उठती है तेज़ी से
अंधों की दुनिया में भी
छवि वही बनाती हूँ
रंग तुम्हारे मिल जाते है

गीत
धीरे चलो
जाना कहा है?
इस घर के बाद भी यही घर है
इस चोट के बाद फिर यही चोट
सुनो ज़रा

गीत

बहती हूँ
या तुम तक जाती हूँ
इत्तफाक
खुमार इस पल के पहले पल का
तुम तक
बस, तुम तक

गीत
बह जाती है

 

(1) इंशा जी उठो, इब्ने इंशा (http://www.anubhuti-hindi.org/anjuman/ibneinsha.htm)

(2) jete paari kintu keno jaabo, Shakti Chattopdhyay (https://priyokobita.wordpress.com/tag/jete-pari-kintu-keno-jabo/)                                       Roughly translated into Hindi it is:                                                                                                             अब नींद में गंगा के धार पर जब खड़ा होता हूँ,
चीता पुकारती है: आओ-आओ

(3)   परिचय की वो गाँठ, त्रिलोचन   ( http://www.anubhuti-hindi.org/gauravgram/trilochan/parichay.htm)

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Could-have-beens

 

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सुना है किसी देश में लोग
मन्नतों के नाम ताले लगाते है
यहा लोग डोरी बाँधते है
कुछ लोग दिए जलाते है
इतना ऐतबार कर लेते है उस पर जिसे कभी देखा ही नहीं

मन्नतें सुनता कौन है?
क्या कोई मन्नतों का एक लिस्ट बनाता है?                                                                                                                       category-wise                                                                                                                                                      money in one column, houses in another                                                                                                 love leaves all columns too short
उस देश में शायद ताले लगा देते है मन्नतों पर
ताकि वो कही उड़ ना जाए, किसी पराए के घर में
किसी और के दिल से वो ना निकले
और किसी को वो ना मिल जाए खुद से पहले

या शायद मन्नतों पर ताले लगाना ही सही है
मन्नतें सब कहा करते है
लोग तो सिर्फ़ माँगते है

उन मन्नतों पर ताले लगाकर
कितने पल इंतेज़ार में बीत जाते है?
गिना है कभी?
कितने पलों बाद हम भूल जाते है हर मन्नत को?
कितने दिनों बाद भी सो नही पाते उस मन्नत के बिना?
कितने बार ही उस ताले को जाकर देखते है
उसकी हिफ़ाज़त करते है
कितने महीनो बाद याद नही रहता
कौनसा टाला था अपना

हर मन्नत के बीच, तालों में क्या मेरा-तेरा
जो है वो सलामत है
यही काफ़ी है

कविता भी शायद मन्नत है
उनका, जो मुककममल ना हुए

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पुराने घरो के दरवाज़े

locked door

 

पुराने घरो के दरवाज़े इतने खूबसूरत क्यू लगते है?
उन पर लगे वो पुराने ताले
वो पुराने खटखटाने वाले डोरबेल्स
उन बंद दरवाज़ो के पीछे, वक़्त भी शायद अरसे से नही गुज़रा

वो दरवाज़े भी क्या बात करते है आपस में?
चौखट पर तो अब जाते-जाते कोई बातें नही करता
ना ही रात को दहलीज़ लांगकर कोई
चुप-चाप कमरे में दौड़ जाता है

अब बचा ही कौन है?
बरसात भी अब घर को छलनी कर जाती है
पहले तो सिर्फ़ लीकेज होती थी

उन बंद दरवाज़ो की सीडियो पर बैठकर
कोई बा स्वेटर नही बुनता
किसिका इंतेज़ार नही करती है बंद खिड़कियाँ

पर उस खटखटाने वाले डोरबेल को बजाओ
तो अब भी लगता है
जैसे उस घर में कोई रहता है
उन सीडियो पर बैठकर
जीवन जैसे छोटी लगने लगती है

उस ताले को हवा ही शायद तोड़ दे किसी दिन

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रहने दो

 

ये झूठ-सच की उलझन भी बेकार है

तुम्हारी पुकार बेवजह ही थी
और बेसमय मतलब ढूँढना भी बेवकूफी ही है
रहने दो
अब छोड़ दिया उन बातों को
अब नही उठती जब रात को तुम पुकारते हो

रुक जाने की,
तो बात ही नही थी

ये बारिश होते-होते भी नही होती
पन्नो को फाड़ देने से बात ख़त्म हो जाती है क्या?

इतनी बातें, इतनी सारी बातें
सब झूठ ही तो है

बुरी आदत लग रही है

टूटी पड़ी है खिड़कियों की आवाज़े
और नींद अब टूटती नही

तुम पुकारते नही अब?
या अब मैं उठती नही?

रहने दो
बारिश होते-होते नही होती

बुरी आदत लग गयी है

 

 

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“Eternal Sunshine of the Spotless Mind”

eternal-sunshine

 

वो Eternal Sunshine of the Spotless Mind वाली सुविधा मिल जाती

तो कितना अच्छा होता ना?

आज के सब मुश्किलो को भुला देती

आज के क्या, हर रोज़ के

 

कितनी बातें यूँ ही निगल जाती हूँ रोज़

याद तो है वो सब,

पर याद उन्हे करती नही

घर से गुस्सा होकर निकल जाना

उस ऑटो्वॅले से हुई सुबह सुबह बहेस

बचपन की वो चोट,

जब कोई ना था पास मरहम लगाने

तुम्हारा उठकर चले जाना बेसमय

मेरा उसे भी भुला देना

 

भूलना चाहूं भी तो कैसे भूल जाऊँ?

वो पहली रात जब नींद ना आई,

बस नही आई

अब वजह कहा ढूँदने जाऊं?

याद नही रहता था वो रास्ता

या फिर भुलाकर जाते थे हम उसे?

उसी गली में कैसे खो जाते थे?

 

नींद नही आती अब भी कभी कभी

उसे भी याद नही करती

जैसे याद नही करूँगी

आज फिर तुम्हारा उठकर चले जाना बेसमय

 

वो Eternal Sunshine of the Spotless Mind वाली सुविधा मिल जाती

तो कितना अच्छा होता ना?

भुला देती सब मुश्किलो को

जो ज़हेन में खुद को दफ़ना देते है

 

सुविधा थी भी क्या वो?

भूल कर भी तो ना भूल पाए

भूल कर भी क्या बदला?

ज़हेन में दबी हुई सब बातें

सभी बातें याद तो है

पर याद उन्हे करती नही,

याद उन्हे करती नही

 

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